भ्रामरी प्राणायाम

प्राणायाम कई प्रकार से किए जाते हैं। लेकिन, सांस संबंधी विकारों को दूर करने में भ्रामरी प्राणायाम खास लाभदायक होता है। इसमें सांस छोड़ते समय भंवरे जैसी आवाज की जाती है। इसलिए इसे भ्रामरी प्राणायाम के नाम से जाना जाता है।
विधि :
  • भ्रामरी प्राणायाम के लिए किसी भी सुखदायक आसन जैसे पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं।
  • रीढ़ की हड्डी बिलकुल सीधी रहे।
  • लंबी और गहरी सांस लेते हुए फेफड़े पूरी तरह भर लें।
  • कुछ सेकंड के लिए सांस रोके रखें। न रूकने की स्थिति में नाक से भंवरे की तरह गुंजन करते हुए सांस को बाहर निकालें। 
  • ध्यान रहे कि गुंजन की लय टूटनी नहीं चाहिए। फिर कुछ सेकंड के लिए सांस बाहर ही रोकें। 
  • शुरू -शुरू में पांच से सात चक्र ही काफी हैं। 
  • धीरे-धीरे संख्या बढ़ाते जाएं। प्रात:काल या सायंकाल उचित है। 
  • बायी नाडी को चन्द्र (इडा, गन्गा) नाडी,और
  • दायी नाडी को सुर्य ( पीन्गला, यमुना ) नाडी कहते है ।

लाभ :
  1. पॉझीटीव्ह एनर्जी तैयार करता है।
  2. सायकीक पेंशनट्स को फायदा होता है।
  3. मायग्रेन पेन, डीप्रेशन,ऑर मस्तिषक के सम्बधित सभि व्यधिओको मिटाने के लिये|
  4. मन और मस्तिषक की शांती मिलती है।
  5. ब्रम्हानंद की प्राप्ती करने के लिये।
  6. मन और मस्तिषक की एकाग्रता बढाने के लिये।

सावधानियां -
  • भ्रामरी प्राणायाम को लेटकर कभी न करें। कानों में किसी तरह का संक्रमण ठीक होने तक यह अभ्यास नहीं करें।
  • लंबी व गहरी सांस लेते हुए सांस को शांत करें।
  • फिर दोनों हाथों के अंगूठे से दोनों कानों को बंद करें।
  • फिर दोनों हाथों की तर्जनी व मध्यमा उंगलियों को आंखों पर तथा अनामिका और कनिष्ठा उंगलियों को होठों पर रखें।
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