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प्रणव प्राणायाम


प्रक्रिया :

सुखासन,सिद्धासन,पद्मासन अथवा वज्रासन में एकदम शान्त बैठें। स्वभाविक रूप से सांस ले | मन को सांसों के आवागमन पर केन्द्रित करपंक्ति सांसों को दृष्टा के रूप मे देखें ।
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उद्गीथ प्राणायाम


प्रक्रिया : सुखासन,सिद्धासन,पद्मासन,वज्रासन में बैठें। लंबी सांस धीरे से लें, और ओउम का जाप करें । सांस को अन्दर और बाहर छोडने की प्रक्रिया लम्बी, धीरे व सूक्ष्म होनी चाहिए । अभ्यास के साथ श्वास अवधी को एक मिनट लम्बाअ करें ।श्वास को शरीर के अन्दर प्रवेश करते हुए महसूस करें ।
अवधि : 10 मिनट या अधिक
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भ्रामरी प्राणायाम

प्राणायाम कई प्रकार से किए जाते हैं। लेकिन, सांस संबंधी विकारों को दूर करने में भ्रामरी प्राणायाम खास लाभदायक होता है। इसमें सांस छोड़ते समय भंवरे जैसी आवाज की जाती है। इसलिए इसे भ्रामरी प्राणायाम के नाम से जाना जाता है।
विधि :
  • भ्रामरी प्राणायाम के लिए किसी भी सुखदायक आसन जैसे पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं।
  • रीढ़ की हड्डी बिलकुल सीधी रहे।
  • लंबी और गहरी सांस लेते हुए फेफड़े पूरी तरह भर लें।
  • कुछ सेकंड के लिए सांस रोके रखें। न रूकने की स्थिति में नाक से भंवरे की तरह गुंजन करते हुए सांस को बाहर निकालें। 
  • ध्यान रहे कि गुंजन की लय टूटनी नहीं चाहिए। फिर कुछ सेकंड के लिए सांस बाहर ही रोकें। 
  • शुरू -शुरू में पांच से सात चक्र ही काफी हैं। 
  • धीरे-धीरे संख्या बढ़ाते जाएं। प्रात:काल या सायंकाल उचित है। 
  • बायी नाडी को चन्द्र (इडा, गन्गा) नाडी,और
  • दायी नाडी को सुर्य ( पीन्गला, यमुना ) नाडी कहते है ।

लाभ :
  1. पॉझीटीव्ह एनर्जी तैयार करता है।
  2. सायकीक पेंशनट्स को फायदा होता है।
  3. मायग्रेन पेन, डीप्रेशन,ऑर मस्तिषक के सम्बधित सभि व्यधिओको मिटाने के लिये|
  4. मन और मस्तिषक की शांती मिलती है।
  5. ब्रम्हानंद की प्राप्ती करने के लिये।
  6. मन और मस्तिषक की एकाग्रता बढाने के लिये।

सावधानियां -
  • भ्रामरी प्राणायाम को लेटकर कभी न करें। कानों में किसी तरह का संक्रमण ठीक होने तक यह अभ्यास नहीं करें।
  • लंबी व गहरी सांस लेते हुए सांस को शांत करें।
  • फिर दोनों हाथों के अंगूठे से दोनों कानों को बंद करें।
  • फिर दोनों हाथों की तर्जनी व मध्यमा उंगलियों को आंखों पर तथा अनामिका और कनिष्ठा उंगलियों को होठों पर रखें।
Read Bharamari Pranayama in English / भ्रामरी प्राणायाम प्राणायाम अंग्रेजी में पढें
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कपालभाती प्राणायाम

कपालभाती प्राणायाम को हठयोग के षट्कर्म क्रियाओं के अंतर्गत लिया गया है। ये क्रियाएँ हैं:- 1. त्राटक 2. नेती. 3. कपालभाती 4. धौती 5. बस्ती 6. नौली। कपालभाती प्राणायाम को हठयोग में शामिल किया गया है। प्राणायामों में यह सबसे कारगर प्राणायाम माना जाता है। यह तेजी से की जाने वाली रेचक प्रक्रिया है। मस्तिष्क के अग्र भाग को कपाल कहते हैं और भाती का अर्थ ज्योति होता है।
विधि :  
  • सुखासन,सिद्धासन,पद्मासन,वज्रासन में बैठें। 
  • और सांस को बाहर फेंकते समय पेट को अन्दर की तरफ धक्का देना है, इस में सिर्फ् सांस को छोडते रेहना है। 
  • दो सांसो के बीच अपने आप सांस अन्दर चली जायेगी, जान-बुजके सांस को अन्दर नही लेना है 
कपाल कहते है मस्तिषक के अग्र भाग को, भाती कहते है ज्योति को,कान्ति को,तेज को; कपालभाती प्राणायाम करने लगतार करने से चहरे का लावण्य बढाता है । कपालभाती प्राणायाम धरती की सन्जीवनि कहलाता है। कपालभाती प्राणायाम करते समय मुलाधार चक्र पर  ध्यान केन्द्रित  करना होता है।  इससे मुलाधार चक्र जागृत हो कर  कुण्डलिनी  शक्ति जागृत होने मे मदद होती है । कपालभाती प्राणायाम करते समय ऐसा सोचना है की, हमारे शरीर के सारे नकारात्मक  तत्व शरीर से बहर जा रहे है। खाना मिले न मिले मगर रोज कमसे कम  5  मिनट कपालभाती प्राणायाम करना ही है,यह द्रिढ संक्लप करना है
लाभ :
  1. बालो की सारी समस्याओँ का समाधान प्राप्त होता है। 
  2. चेहरे की झुर्रियाँ, आखो के नीचे  के डार्क सर्कल मिट जयेंगे ।
  3. थायराँइड की समस्या से निदान मिल सकता है।   
  4. सभी प्रकारके चर्म समस्या मिट जाती है।  
  5. आखो की सभी प्रकारकी समस्या मिट जाती है,और आखो की रोशनी लौट आती है। 
  6. दातों की सभी प्रकार की समस्या मिट जाती है, और दातों की खतरनाक पायरीया जैसी बीमारी भी ठीक हो जाती है। 
  7. कपालभाती प्राणायाम से शरीर की बढी चरबी घटती है, यह इस प्राणायाम का सबसे बडा फायदा है।
  8. कब्ज, अँसीडिटी, गँस्टीक जैसी पेट की सभी समस्याएँ मिट जाती हैं। 
  9. गर्भाशय (युट्रस)(महीलाओ) की सभी समस्याओँ का समाधान होता है।  
  10. डायबिटीस संपूर्णतया ठीक होता है| कोलेस्ट्रोल को घटाने में भी सहायक है।  
  11. सभी प्रकार की अँलार्जीयाँ मिट जाती है। 
  12. सबसे खतरनाक कँन्सर रोग तक ठीक हो जाता है । 
  13. शरीर में स्वतः हिमोग्लोबिन तैयार होता है। 
  14. शरीर मे स्वतः कँल्शीयम तैयार होता है। 
  15. किडनी स्वतः स्वच्छ होती है, डायलेसिस करने की जरुरत नहीं पडती। 
  16. Read Kapal Bhati Pranayama in English / कपालभाती प्राणायाम अंग्रेजी में पढे
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बाह्य प्राणायाम

प्रक्रिया :  ठुडी को गले से लगा दे, पेट के नीचे बन्द लगा दे और साँस बाहर छोडकर पेट को अन्दर रीढ की हड्डी से चिपका दे, थोडी देर साँस बाहर छोडकर रखे।
अवधि : इसे 2-5 बार करे. इस प्राणायाम से कपालभाति से मिलने वारे सारे फायदे होते है, दूसरे शब्दो मे यह कपालभाति का पूर्णक है।
लाभ : कब्ज, अँसीडीटी,गँसस्टीक, हर्निया, धातु,और पेशाब से संबंधित सभी समस्याएँ मिट जाती हैं सावधानी : हाइपरटेन्शन व ह्र्दय रोग से पीडीत व्यक्तियों को बाह्य प्राणायाम नहीं करना चाहिए ।
बाह्य प्राणायाम- विस्त्रित जानकारी
 प्रक्रिया :
  • इस प्राणायाम को करने के लिए आप सिद्धासन में बैठकर ( मतलब दोनों पेरो कि एडी को एक के ऊपर एक रखे तथा हाथो को घुटनों पर रखे और हाथो के अंगूठे तथा अंगूठे के पास वाली उंगली को मिलाकर अपने मेरुदण्ड को सीधा करके बैठ जाये ।  
  • अब श्वास को गहरा अन्दर भरें। 
  • अब श्वास को पुरी तरह से बाहर निकाल दे और पेट कि नाभि को मेरुदंड से मिलाने का प्रयत्न करे. क्षमता अनुसार इस स्थिति में रुके तथा फिर अपनी पूर्व स्थिति में आजावे | सांस को पूरी तरह बाहर निकालने के बाद सांस बाहर ही रोके रखने के बाद तीन बन्ध लगाते है| 
    • 1) जालंधर बन्ध :- गले को पूरा सिकुड के ठोडी को छाती से सटा कर रखना है।
    • 2) उड़ड्यान बन्ध :- पेट को पूरी तरह अन्दर पीठ की तरफ खीचना है।  
    • 3) मूल बन्ध :- हमारी मल विसर्जन करने की जगह को पूरी तरह ऊपर की तरफ खींचना है।  
अवधी:   इसे 2-5 बार करे । आप इसे इच्छा अनुसार दस से पन्द्रह मिनट तक भी कर सकते हैं ।
लाभ: 
  1. कब्ज, अँसीडीटी,गँसस्टीक, जैसी पेट की सभी समस्याएँ मिट जाती हैं । 
  2. हर्निया पूरी तरह ठीक हो जाता है। 
  3. यह आपकी डायबिटीज को दूर करता हैं ।  तथा उदर और पेन्क्रियास को ठीक रखता हैं ।  
  4. धातु,और पेशाब से संबंधित सभी समस्याएँ मिट जाती हैं । 
  5. मन की एकाग्रता बढती है । 
  6. व्यंधत्व (संतान हीनता) से छुट्कारा मिलने में भी सहायक है । 
सावधानियाँ:  ह्दयरोगी तथा उच्च रक्त चाप वाले व्यक्ति इसे न करे  ।  मासिकधर्म के समय महिलाये इस प्राणायाम को ना करे ।
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भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका का शब्दिक अर्थ है धौंकनी अर्थात एक ऐसा प्राणायाम जिसमें लोहार की धौंकनी की तरह आवाज करते हुए वेगपूर्वक शुद्ध प्राणवायु को अन्दर ले जाते हैं और अशुद्ध वायु को बाहर फेंकते हैं।
प्रक्रिया : एक आरामदायक आसन में बैठें| दोनों नासिका से सांस लें, जब, फेफेड़ें पूरे भर जाएँ और डायाफ्राम फैला हो, फिर धीरे धीरे साँस बाहर छोड़ें
अवधि : कम से कम 2 मिनट 5 अधिकतम मिनट
लाभ : हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क, अवसाद, माइग्रेन, लकवा, तंत्रिका तंत्र, आभा, तेज, मोटापा, कब्ज, गैस्ट्रिक, अम्लता, Croesus (यकृत), हेपेटाइटिस बी, गर्भाशय, मधुमेह, पेट की समस्याओं, कोलेस्ट्रॉल, एलर्जी समस्याओं, अस्थमा, खर्राटे ले, एकाग्रता, और यहां तक कि कैंसर और एड्स

भस्त्रिका प्राणायाम - विस्त्रित वर्णन

विधि : इस प्राणायाम को अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार तीन प्रकार से किया जा सकता है। मंद गति से, मध्यम गति से तथा तीव्र गति से। जिनके फेफड़े व हृदय कमजोर हों, उनको मंद गति से रेचक व पूरक करते हुए यह प्राणायाम करना चाहिए। स्वस्थ व्यक्ति व पुराने अभ्यासी को धीरे-धीरे श्वास-प्रश्वास की गति बढ़ाते हुए मध्यम और फिर तीव्र गति से भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए
  • सुखासन सिद्धासन,पद्मासन,वज्रासन अथवा किसी एक आरामदायक आसन में बैठें|
  • दोनों नासिका से सांस लें, जब, फेफेड़ें पूरे भर जाएँ और डायाफ्राम फैला हो, फिर धीरे धीरे साँस बाहर छोड़ें।
  • फिर धीरे से साँस बाहर निकालें ।
  • ध्यान रहे कि श्वास लेते समय पेट फूलना नहीं चाहिए।
नाक से लंबी सांस फेफडो मे ही भरे, फिर लंबी सांस फेफडो से ही छोडें| सांस लेते और छोडते समय एकसा दबाव बना रहे| हमें हमारी गलतीयाँ सुधारनी है, एक तो हम पुरी सांस नही लेते; और दुसरा हमारी सांस पेट में चाली जाती है| देखिये हमारे शरीर में दो रास्ते है, एक ( नाक, श्वसन नलिका, फेफडे), और दूसरा( मुँह्, अन्ननलिका, पेट्)| जैसे फेफडोमें हवा शुद्ध करने की प्रणली है,वैसे पेट में नही है| उसीके का‍रण हमारे शरीर में आँक्सीजन की कमी मेहसूस होती है| और उसेके कारण हमारे शरीर में रोग जडते है| उसी गलती को हमें सुधारना है|जैसे की कुछ पाने की खुशि होति है,वैसे हि खुशि हमे प्राणायाम करते समय होनि चाहिये|और क्यो न हो सारि जिन्दगि का स्वास्थ आपको मील रहा है| आप के पन्चविध प्राण सशक्त हो रहे है, हमारे शरीर की सभि प्रणालिया सशक्त हो रही है|
अवधि :  इस प्राणायाम को सामान्यत: 3-5 मिनट तक करना चाहिए। भस्त्रिका प्राणायाम में श्वास को अंदर भरते हुए मन में विचार करना चाहिए कि ब्रह्मांड में विद्यमान दिव्य शक्तियों से ओत-प्रोत हो रहा हूं। इस प्रकार दिव्य संकल्प के साथ किया हुआ प्राणायाम विशेष लाभप्रद होता है
लाभ: 

  • इस प्राणायाम से शरीर को प्राणवायु अधिक मात्रा में मिलती है जिसके कारण यह शरीर के सभी अंगों से दूषित पदार्थों को दूर करता है ।
  • भस्त्रिका प्राणायाम करते समय हमारा डायाफ्राम तेजी से काम करता है, जिससे पेट के अंग मजबूत होकर सुचारु रूप से कार्य करते हैं और हमारी पाचन शक्ति भी बढ़ती है ।
  • मस्तिष्क से संबंधित सभी विकारों को मिटाने के लिए भी यह लाभदायक है ।
  • आँख, कान और नाक के स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी यह प्राणायाम लाभदायक है ।
  • वात, पित्त और कफ के दोष दूर होते हैं तथा पाचन संस्थान, लीवर और किडनी की अच्छे से एक्सरसाइज हो जाती है।
  • मोटापा, दमा, टीबी और श्वासों के रोग दूर हो जाते हैं। स्नायुओं से संबंधित सभी रोगों में यह लाभदायक माना गया है।
  • पर्किनसन,प्यारालेसिस,लुलापन इत्यादि स्नायुओं से सम्बंधित सभी व्यधिओं को मिटाने के लिये |
  • भगवान से नाता जोडने के लिये |
  • सर्दी-जुकाम, एलर्जी, श्वास रोग, पुराना नजला, साइनस आदि समस्त कफ रोग दूर होते हैं |
  • भस्त्रिका प्राणायाम फेफडों को सशक्त बनाने के लिये लाभदायक है | फेफड़े सबल बनते हैं तथा हृदय व मस्तिष्क को भी शुद्ध प्राण वायु मिलने से आरोग्य लाभ होता है ।
  • थायराइड व टॉन्सिल जैसे गले के सभी रोग दूर होते हैं ।
  • त्रिदोष सम होते हैं। रक्त परिशुद्ध होता है तथा शरीर के विषाक्त, विजातीय द्रव्यों को निष्कासन होता है।
  • प्राण व मन स्थिर होता है। प्राणोत्थान व कुंडलिनी जागरण में सहायक है।
सावधानियां:

  1. भस्त्रिका प्राणायाम करने से पहले नाक बिल्कुल साफ कर लें ।
  2. भ्रस्त्रिका प्राणायाम प्रात: खुली और साफ हवा में करना चाहिए ।
  3. क्षमता से ज्यादा इस प्राणायाम को नहीं करना चाहिए । प्राणायाम करते समय शरीर को न झटका दें और ना ही किसी तरह से शरीर हिलाएँ । श्वास लेने और श्वास छोड़ने का समय बराबर रखें ।
  4. जिनको उच्च रक्तचाप व हृदय रोग हो उनहें मंद गति से ही भस्त्रिका करना चाहिए।
  5. इस प्राणायाम को करते समय जब श्वास को अंदर भरें तब पेट को नहीं फुलाना चाहिए।
  6. श्वास डायाफार्म तक भरें, इससे पेट नहीं फूलेगा, पसलियों तक छाती ही फूलेगी।
  7. कफ की अधिकता या साइनस आदि रोगों के कारण जिनके दोनों नासा छिद्र ठीक से खुले हुए नहीं होते उन लोगों को पहले दाएं स्वर को बंद करके बाएं से रेचक व पूरक करना चाहिए। फिर बाएं को बंद करके दाएं से यथाशक्ति मंद, माध्यम या तीव्र गति से रेचक व पूरक करना चाहिए। फिर अंत में दोनों स्वरों इड़ा व पिंगला से रेचक व पूरक करते हुए भस्त्रिका प्राणायाम करें।
  8. प्राणायाम की क्रियाओं को करते समय आंखों को बंद रखें और मन में प्रत्येक श्वास-प्रश्वास के साथ ओउम का मानसिक रूप से चिंतन व मनन करना चाहिए।

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स्वामी रामदेव के सात प्राणायाम

योग के आठ अंगों में से चौथा अंग है प्राणायाम। प्राण+आयाम से प्राणायाम शब्द बनता है। प्राण का अर्थ जीवात्मा माना जाता है । आयाम के दो अर्थ है- प्रथम नियंत्रण या रोकना, द्वितीय विस्तार । हम जब साँस लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु पाँच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पाँच जगह स्थिर हो जाता हैं। ये पंचक निम्न हैं- (1) व्यान, (2 )समान, (3) अपान, (4) उदान और (5) प्राण।
बाबा रामदेव के प्राणायाम और योगासनो से लोगो को असाध्य रोगो मे फायदा हो रहा हो. कैन्सर,मधुमेह, ब्लड प्रेशर, बढा वजन और ढेर सारी बिमारिया जिसका आपने शायद नाम भी न सुना होगा, मे लोगो को इससे लाभ हो रहा है.

बाबा रामदेव के सात प्राणायाम

बाबा रामदेव के सात प्राणायाम को सक्षिंप्त रूप से वणित किया गया है, विस्त्रित जानकारी के लिए सम्बधिंत प्राणायाम के नाम पर अथवा चित्र पर क्लिक करें !!

1. भस्त्रिका प्राणायाम

प्रक्रिया :किसी भी आरामदायक आसन में बैठें । दोनो नासिकाओं से तब तक सांस लें जब तक कि फेफडे पूरी तरह से न भर जांए और डाईफ्राम फैल जाए । फ़िर धीरे से सांस को बाहर फैंके । गहरी सांसे लें और पुरी तरह से खाली करें ।
अवधी : कम से केम 2 मिनट और अधिकतम पंक्ति मिनट ।
लाभ :ह्र्दय, फेफेडे, दिमाग, डिप्रेशन, सिर दर्द, माईग्रैन, लकवा, आभा तेज, मोटापा, कब्ज, गैस्ट्रिक, लिवर सम्बन्धी रोग, हेपाटिटिस - बी, गर्भाशय, मधुमेह, अमाशय सम्बन्धि समस्याओं,कौलेस्टरौल, एलर्जी, दमा, खर्राटे लेना, एकाग्रता, कैन्सर, एड्स । अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

2. कपाल भाती प्राणायाम

प्रक्रिया :हवा जोर लगाकर बाहर फेँके(पेट अन्दर जायेगा) ।
अवधी :30 बार या 1 मिनट से शुरु करके, 5 मिनट और ज्यादा बिमारी हो तो 15-20 मिनट तक कर सकते है ।
लाभ :मोटापे को कम करने मे, पेट की तमाम बिमारिया (कब्ज,एसिडिटी आदि), गुर्दा, मधुमेह , सोते समय नाक बजना (खर्राटे लेना), कोलेस्ट्रोल और चेहरे का ओज-तेज, गैस्ट्रिक, हेपाटिटिस - बी, गर्भाशय, मधुमेह, , एलर्जी, दमा, एकाग्रता, कैन्सर, एड्स आदि मे लाभदायक ।
सावधानी : ह्र्दय रोगी व उच्च रक्तचाप और कमजोर लोग इस प्राणायाम को धीरे से करें । अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

3. बाह्य प्राणायाम

प्रक्रिया : ठुडी को गले से लगा दे, पेट के नीचे बन्द लगा दे और साँस बाहर छोडकर पेट को अन्दर रीढ की हड्डी से चिपका दे, थोडी देर साँस बाहर छोडकर रखे ।
अवधी :इसे 2-5 बार करे. इस प्राणायाम से कपालभाति से मिलने वारे सारे फायदे होते है, दूसरे शब्दो मे यह कपालभाति का पूर्णक है ।
लाभ :कब्ज, अँसीडीटी,गँसस्टीक, हर्निया, धातु,और पेशाब से संबंधित सभी समस्याएँ मिट जाती हैं ।
सावधानी : ह्र्दय रोगी व उच्च रक्तचाप से ग्रसित लोग इस प्राणायाम को न करें । अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

4. अनुलोम विलोम प्राणायाम

प्रक्रिया :दाई नाक अगुँठे से बन्द करे, बाई से लम्बी साँस ले । अब दाई नाक खोले और बाई नाक को मध्य अँगुली से बन्द करे, और दाई नाक से साँस बाहर छोडे. अब दाई नाक से साँस अन्दर ले । अब दाई नाक अगुँठे से बन्द करे, बाई से साँस बाहर छोडे ।
अवधी : कम से कम 10 मिनट ।
लाभ : इस प्राणायाम से दिल,धमनियो की रुकावट (ब्लड प्रेशर), जोडो का दर्द दिमाग, माइग्रेन, लकवा, स्नायु सम्बन्धित,अस्थमा, एलर्जी आदि मे लाभ होता है ।
सावधानी : श्वासों को फेफडे में भरें न कि पेट मे। पेट मे कोइ भी अंग आक्सीजन को शोषित नहीं करता है । जल्दबाजी न करें धीरे से करें, आव्श्यकता पर विश्राम करें । अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

5. भ्रामरी प्राणायाम


प्रक्रिया : लंबी और गहरी सांस लेते हुए फेफड़े पूरी तरह भर लें। कुछ सेकंड के लिए सांस रोके रखें। न रूकने की स्थिति में नाक से भंवरे की तरह गुंजन करते हुए सांस को बाहर निकालें। ध्यान रहे कि गुंजन की लय टूटनी नहीं चाहिए। फिर कुछ सेकंड के लिए सांस बाहर ही रोकें।
अवधी : शुरू -शुरू में पांच से सात चक्र ही काफी हैं। धीरे-धीरे संख्या बढ़ाते जाएं।
लाभ :चिंता, हाइपर्टैन्शन, उच्च रक्तचाप, हार्ट बलौकेज, लकवा, माईग्रैन, आत्मविश्वास, एकाग्रता अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

6. उद्गीथ प्राणायाम

प्रक्रिया : सुखासन,सिद्धासन,पद्मासन,वज्रासन में बैठें। लंबी सांस धीरे से लें, और ओउम का जाप करें । सांस को अन्दर और बाहर छोडने की प्रक्रिया लम्बी, धीरे व सूक्ष्म होनी चाहिए । अभ्यास के साथ श्वास अवधी को एक मिनट लम्बा करें । श्वास को शरीर के अन्दर प्रवेश करते हुए महसूस करें । आरम्भिक अवस्था मे साधक श्वांस को केवल नाक में ही महसूस करेगा और अभ्यास के साथ साँस को शरीर के अन्दर भी महसूस किया जा सकता है ।
अवधी : 10 मिनट या अधिक
लाभ :बुरे स्वपन से निजात पाने और गहरी नींद के लिए लाभदायक । मन को एकाग्र करने व योगनिन्द्रा के अभयास के लिए भी लाभदायक मायग्रेन पेन, डीप्रेशन,ऑर मस्तिषक के सम्बधित सभी व्यधिओको मीटाने के लिये । ब्रम्हानंद की प्राप्ती करने के लिए। मन और मस्तिषक की एकाग्रता बढाने के लिये। अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

7. प्रणव प्राणायाम

प्रक्रिया : सुखासन,सिद्धासन,पद्मासन अथवा वज्रासन में एकदम शान्त बैठें। स्वभाविक रूप से सांस ले | मन को सांसों के आवागमन पर केन्द्रित करपंक्ति सांसों को दृष्टा के रूप मे देखें ।
अवधी :2-5 मिनट या अधिक
लाभ : प्रणव प्राणायाम से मन और मस्तिषक की शांति मिलती है| ब्रम्हानंद की प्राप्ती करने के लिए और मन और मस्तिषक की एकाग्रता बढाने के लिये बहुत उपयोगी है । अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...
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कामसूत्र और आसन

महर्षि वात्स्यायन ने कामसूत्र में न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है वरन कला, शिल्पकला एवं साहित्य को भी संपदित किया है। अर्थ के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य का है, काम के क्षेत्र में वही स्थान महर्षि वात्स्यायन का है। महर्षि वात्स्यायन का कामसूत्र विश्व की प्रथम यौन संहिता है खजुराहो से लेकर वात्सायन के कामसूत्र जैसी कृतियों में सेक्स के हर पहलू पर रोशनी डाली गई है। स्वस्थ व सुखी जीवन के लिए संयमित सेक्स को उपयोगी बताया गया है। 
सेक्स शरीर की एक जरुरत है और साथ ही इंसान के जीवन चक्र को जारी रखने वाला जरिया भी। आम जीवन में सेक्स को लेकर बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं। जानकारी के अभाव में, परिस्थितियों के कारण या फिर मनोविकार के कारण इंसान बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य करके सामाजिक बहिष्कार का पात्र बन जाता है। 
 काम की व्याख्या द्वि-आयामी है। प्रथम सामान्य एवं द्वितीय विशेष। सामान्य के अन्तर्गत पंचेन्द्रिओं द्वारा प्राप्त होने वाले आनन्द एवं रोमांच का समावेश किया गया है जिसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध मन एवं चेतना से जुड़ा हुआ है। इन्हीं के द्वारा मनोशारीरिक क्रिया एवं प्रतिक्रिया का संचालन होता है। विशेष के अन्तर्गत स्पर्शेन्द्रिओं की भूमिका प्रतिपादित की गई है। 
काम एक अत्यन्त शक्तिशाली मूल प्रवृत्ति (Instinct) है। काम ही जीवन का संपदन, जीवन का उद्गम, उसके अस्तित्व तथा उसकी गतिशीलता तथा नर-नारी के पारस्परिक अकर्षण एवं सम्मोहन का रहस्य है। वास्तव में काम ही विवाह एवं दाम्पत्य सुख-शांति की आधारशिला है। काम का सम्मोहन ही नर-नारी को वैवाहिक-सूत्र में आबद्ध करता है। अतः विवाहित जीवन में आनन्द की निरन्तर रस-वर्षा करते रहना ही कामसूत्र का वास्तविक उद्देश्य है। 
 आमतौर पर यह धारणा प्रचलित है कि संभोग के अनेक आसन होते हैं। 'आसन' कहने से हमेशा योग के आसन ही माने जाते रहे हैं। जबकि संभोग के सभी आसनों का योग के आसनों से कोई संबंध नहीं। लेकिन यह भी सच है योग के आसनों के अभ्यास से संभोग के आसनों को करने में सहजता पाई जा सकती है। 
 योग के आसनों को हम पाँच भागों में बाँट सकते हैं:- 
  1. पहले प्रकार के वे आसन जो पशु-पक्षियों के उठने-बैठने और चलने-फिरने के ढंग के आधार पर बनाए गए हैं जैसे- वृश्चिक, भुंग, मयूर, शलभ, मत्स्य, सिंह, बक, कुक्कुट, मकर, हंस, काक आदि। 
  2. दूसरी तरह के आसन जो विशेष वस्तुओं के अंतर्गत आते हैं जैसे- हल, धनुष, चक्र, वज्र, शिला, नौका आदि। 
  3. तीसरी तरह के आसन वनस्पतियों और वृक्षों पर आधारित हैं जैसे- वृक्षासन, पद्मासन, लतासन, ताड़ासन आदि। 
  4. चौथी तरह के आसन विशेष अंगों को पुष्ट करने वाले माने जाते हैं-जैसे शीर्षासन, एकपादग्रीवासन, हस्तपादासन, सर्वांगासन आदि। 
  5. पाँचवीं तरह के वे आसन हैं जो किसी योगी के नाम पर आधारित हैं-जैसे महावीरासन, ध्रुवासन, मत्स्येंद्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन आदि। 
संभोग के आसनों का नाम : 
  • आचार्य बाभ्रव्य के  सात आसन:- 
    1. उत्फुल्लक, 
    2. विजृम्भितक, 
    3. इंद्राणिक, 
    4. संपुटक, 
    5. पीड़ितक, 
    6. वेष्टितक, 
    7. बाड़वक। 
  • आचार्य सुवर्णनाभ के  दस आसन :- 
    1. भुग्नक, 
    2. जृम्भितक, 
    3. उत्पी‍ड़ितक, 
    4. अर्धपीड़ितक, 
    5. वेणुदारितक, 
    6. शूलाचितक, 
    7. कार्कटक, 
    8. पीड़ितक, 
    9. पद्मासन और 
    10. परावृत्तक। 
  • आचार्य वात्स्यायन के आसन :- 
    • विचित्र आसन : 
      1. स्थिररत, 
      2. अवलम्बितक, 
      3. धेनुक, 
      4. संघाटक, 
      5. गोयूथिक, 
      6. शूलाचितक, 
      7. जृम्भितक और 
      8. वेष्टितक। 
    • अन्य आसन : 
      1. उत्फुल्लक, 
      2. विजृम्भितक, 
      3. .इंद्राणिक, 
      4. संपुटक, 
      5. पीड़ितक, 
      6. बाड़वक 
      7. भुग्नक 
      8. उत्पी‍ड़ितक, 
      9. अर्धपीड़ितक, 
      10. .वेणुदारितक, 
      11.  कार्कटक 
      12. परावृत्तक आसन 
      13. द्वितल और 
      14. व्यायत।
यहाँ आसनों के नाम लिखने का आशय यह कि योग के आसनों और संभोग के आसनों के संबंध में भ्रम की निष्पत्ति हो। संभोग के उक्त आसनों में पारंगत होने के लिए योगासन आपकी मदद कर सकते हैं। इसके लिए आपको शुरुआत करना चाहिए 'अंग संचालन' से अर्थात सूक्ष्म व्यायाम से।
 इसके बाद निम्नलिखित आसन करें:-
  1.  पद्‍मासन : इस आसन से कूल्हों के जाइंट, माँसमेशियाँ, पेट, मूत्राशय और घुटनों में खिंचाव होता है जिससे इनमें मजबूती आती है और यह सेहतमंद बने रहते हैं। इस मजबूती के कारण उत्तेजना का संचार होता है। उत्तेजना के संचार से आनंद की दीर्घता बढ़ती है। 
  2. भुजंगासन : भुजंगासन आपकी छाती को चौड़ा और मजबूत बनाता है। मेरुदंड और पीठ दर्द संबंधी समस्याओं को दूर करने में फायदेमंद है। यह स्वप्नदोष को दूर करने में भी लाभदायक है। इस आसन के लगातार अभ्यास से वीर्य की दुर्बलता समाप्त होती है 
  3.  सर्वांगासन : यह आपके कंधे और गर्दन के हिस्से को मजबूत बनाता है। यह नपुंसकता, निराशा, यौन शक्ति और यौन अंगों के विभिन्न अन्य दोष की कमी को भी दूर करता है। 
  4.  हलासन : यौन ऊर्जा को बढ़ाने के लिए इस आसन का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पुरुषों और महिलाओं की यौन ग्रंथियों को मजबूत और सक्रिय बनाता है। 
  5.  धनुरासन : यह कामेच्छा जाग्रत करने और संभोग क्रिया की अवधि बढ़ाने में सहायक है। पुरुषों के ‍वीर्य के पतलेपन को दूर करता है। लिंग और योनि को शक्ति प्रदान करता है। (
  6. पश्चिमोत्तनासन : सेक्स से जुड़ी समस्त समस्या को दूर करने में सहायक है। जैसे कि स्वप्नदोष, नपुंसकता और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दोषों को दूर करता है।
  7. भद्रासन : भद्रासन के नियमित अभ्यास से रति सुख में धैर्य और एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है। यह आसन पुरुषों और महिलाओं के स्नायु तंत्र और रक्तवह-तन्त्र को मजबूत करता है। 
  8.  मुद्रासन :मुद्रासन तनाव को दूर करता है। महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े हए विकारों को दूर करने के अलावा यह आसन रक्तस्रावरोधक भी है। मूत्राशय से जुड़ी विसंगतियों को भी दूर करता है। 
  9. मयुरासन : पुरुषों में वीर्य और शुक्राणुओं में वृद्धि होती है। महिलाओं के मासिक धर्म के विकारों को सही करता है। लगातार एक माह तक यह आसन करने के बाद आप पूर्ण संभोग सुख की प्राप्ति कर सकते हो। 
  10.  कटी चक्रासन : यह कमर, पेट, कूल्हे, मेरुदंड तथा जंघाओं को सुधारता है। इससे गर्दन और कमर में लाभ मिलता है। यह आसन गर्दन को सुडौल बनाकर कमर की चर्बी घटाता है। शारीरिक थकावट तथा मानसिक तनाव दूर करता है।
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Home Remedies To Increase Breast Size

Breasts are important to both men and women. Breast size is one of the major factors that influence a woman’s self esteem and her perception of feminine charm. Women's self-confidence is often tied to the size of their breasts. You can increase the size of your breast, boost your self confidence and also have a good and healthy self image.

Home Remedies To Increase Breast Size

Breast Message : Massaging your breasts for 20-30 minutes a day, there will be an appreciable increase in the size of your breast. Massage does two things to stimulate growth. One benefit of massage is increased circulation. Since phytoestrogens travel through the bloodstream, the more blood you have flowing to your breasts, the easier it is for your breast receptors to pick up what they need in order to grow. Another benefit of massage is prolactin production. This important breast-enlarging hormone is triggered by regular stimulation of the breasts and nipples.
  • To perform the massage, start by rubbing your hands together as fast as you can to generate heat and energy.
  • Once your hands are warm, place them on your breasts.
  • Rub inwards with your hands and continue around your breasts in a circle.
  • Your right hand will circle in a clockwise direction, and your left hand will circle counter-clockwise
  • Do a minimum of 100-300 circular rubs in the morning and another 100-300 circular rubs before you go to bed.
  • Each circular rub should last about 2 seconds. Pause occasionally and rub your hands together to re-warm them.
  • The full 300 rubs should take about 10-15 minutes. By doing this twice a day, you should be able to increase a cup size within 30 days.
  • This method of breast massage is a part of an ancient Taoist exercise, the female deer exercise. That means it has been used and tested for hundreds, possibly thousands of years. All you need is some time, your hands, and dedication to have larger breasts in just 30 days
Tips for Breast Enlargement:
  • Stimulate circulation by alternate hot and cold water rinses. Swimming is an ideal exercise for improving the shape of the breast especially breast-stroke and back-stroke. Playing badminton is very helpful.
  • You stand or sit with your back erect. Clasp your hands in a prayer pose and hold it at your chest level. Now, push the 1 palm powerfully against the other, till you feel a pressure in the chest. Hold to the count of 20. Then, eventually increase the count.
  • This exercise is very helpful in toning up pectorals. They become firmer and give a lift to the breasts.
  • Massage the breasts gently but firmly with ‘Yuvatyaadi oil’ and ayurvedic preparation. A regular use of oil is claimed to improve firmness and shape of breasts. While massaging work upwards and in circular motion.
  • Pomegranate toner is useful in enhancing firm youthful quality to your breasts. Weight gain will also help you. Putting on weight will increase the fat deposition in the breast and hence enlarge breast size.
  • Last but not the least is with weight gain the size of the breast will increase and with exercise and massage the shape and firmness.
  • Size of the breast does not increase with massage or exercise. Massage and exercise will only help in getting your breast good tone and shape.

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Yoga Poses to Increase Sex Power

Yoga is very beneficial in improving your sex life. Here are few reasons. Improved sensitivity Yoga helps in improving one's sensitivity. Its breathing exercises help a person overcome his anxiety and participate in sex with a fresh vigor. When a person is relieved from tension and stress, he/she will actively participate in sexual activity. Other than this yoga helps in improving better understanding of self and surrounding leaving a person more understanding and emphatic about other's need.
The postures that promise pleasure:
Yoga asanas like Mula Bandha, Uddiyana Bandha Halasana, Matsyasana and Viprita Karani Sarvangasana Sirhasana are some of the postures that help in better sexual performance, lets dug out a few easy-to-do yoga movements that will help you gain a great sex life.
Contracting and releasing the muscles of pubic area
The most common sexual yoga exercise that is used to enhance libido and sexual gratification is a posture that one can do even while sitting in the office. Contract and release the muscles of your pubic area as if you want to stop the flow of urine. Experts say that they have seen many people reviving their sex lives with the help of this one simple exercise. It indeed helps to get more powerful orgasms. Alternately, while you are seated or are standing, contract and then release the pubococcygeus muscle located between the pubic bone and the tailbone, as if you wanted to stop the flow of urine. You can even do this at your desk, say, 10 times at three workday intervals. This is called the Mula Bandha in Sanskrit and is one of the most important postures to practice for a great orgasm. This one's for both your partner and you.
Deep breathing yoga technique
Have some more time on your hand? Try this: you can lie on the floor and put your legs against the wall. Focus on breathing properly. Do the deep breathing yoga technique where you inhale the air through your nose and exhale it out of your mouth. This exercise will help you feel re-energised and you will be able to enjoy sex without feeling tired. In addition, it will help to heighten the sensations. 
The simplest yogic breathing that will enhance your sex life is called balancing Pranayam. In this you will have to alternately breath through each of your nostrils. This helps to harness sexual power. Practice of yoga awakens the body senses to the extent that each body cell can experience the bliss of the partners' touch during the act. Yoga makes the core muscles flexible, as a result the body becomes more open and you can perform various postures while you make love, with complete ease. This naturally increases the pleasure. Practicing certain asanas will calm your mind, thus helping you focus and concentrate better. Multiple orgasms can then be a regular phenomenon. Yoga also helps partners to bond and the combined aura of the two of you will allow long-lasting sex. The following are some specific yoga postures which may help improve your sex life.
  • Lotus Position - Padamasana:
    • In this posture, the person sits cross-legged and feet are placed on opposite thighs. The appearance of the position resembles the lotus flower and hence the name.
  • Halasana:
    • The practitioner lies straight on the floor. Keeping legs together and straight, he raises the legs and takes them behind the head. Hands are kept firmly to the floor and parallel to the upper body. The name is derived from the word ` hala`, which means plow.
  • Uddiyana Bandhas:
    • It is done by pulling the abdomen inwards after exhaling all the air. While doing so, take a false inhale, hold your breath, pause and release the abdomen. This cycle of doing false inhale and complete exhale is repeated several times. Bandhas means internal lock. While doing this asana, the air is blocked to enter the lungs. Once the cycles are over, the lung receives fresh air.
  •  Shirshasana:
    • It is one of the very famous asana in which the practitioner stands on the head, supported just by forearms. This asana is also known as the king of all yoga asanas.
  • Viprita Karani:
    • To perform this asana, lie straight on the floor and raise legs perpendicular to the body.
  • Sarvangasana:
    • This is an interesting asana in which the entire weight of the body is put on the neck, the head, upper back and upper arms. The hands are held behind the back and slowly, the legs and the lower body is raised upward.
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