प्राणायाम शरीर और मन के बीच की कड़ी है
महर्षि पतंजलि ने कहा है, ‘श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायम’ यानी प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है। पतंजलि योग सूत्र के अनुसार योगी प्राणायाम के द्वारा आत्मा के प्रकाश में बाधक अविद्या को हटाता है। शरीर, मन तथा प्राण को शुद्ध करने के लिए प्राणायाम बहुत अच्छा साधन है। इसके निरंतर अभ्यास से अंतर्चेतना जागृत होती है। स्नायुमंडल की शुद्धि होती है। शरीर का कोई भी रोग ऐसा नहींप्राण, अपान, समान आदि वायुओं से मन को रोकने और शरीर को साधने का अभ्यास करना अर्थात प्राणों को आयाम देना ही प्राणायाम है।
'प्राणस्य आयाम: इत प्राणायाम'। ''श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायाम''-(यो.सू. 2/49) अर्थात प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है। वेद और योग में आठ प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है, जिनमें जीव विचरण करता है। योगी के लिए सभी साध्य हैं।
आयु : प्राणायाम का अर्थ होता है प्राणवायु या शक्ति का विस्तार। सबमें निहित है प्राणशक्ति। शरीर और मन के बीच की कड़ी है प्राण। प्राणों से ही शरीर और मन को शक्ति मिलती है। प्राण को आयु भी कहते हैं अर्थात प्राणायाम से दीर्घायु हुआ जा सकता है।
इसी क्रिया को विधि अनुसार ध्यान तथा लगन से भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाता है, तो प्राणायाम कहलाता है। इससे शक्ति संपन्नता प्राप्त होती है।
श्वास-प्रश्वास : शरीर शक्ति प्राप्त करता है श्वसन क्रिया से। यदि आपकी श्वास में रुकावट है तो सभी अंगों पर इसका प्रभाव पड़ता है। श्वास का तेज चलना या अत्यंत धीमे चलने से रक्त प्रवाह और अन्य अंगों की कार्यप्रणाली में व्यवधान उत्पन्न होता है। यह श्वास कैसे पुष्ट हो, स्वस्थ हो और लय में चले, इसके लिए योग में प्राणायाम की विधियों का प्रावधान है। श्वास-प्रश्वास से शरीर की मुख्य नाडि़यों का संचालन होता है। वे प्रमुख नाडि़याँ तीन हैं। पहली इड़ा, दूसरी पिंगला और तीसरी सुसुम्ना।
इड़ा या चंद्र नाड़ी : यह शरीर के बाएँ भाग को नियंत्रण करती है। यह ठंडी है तथा मानव के विचारों और भावों को नियंत्रित करती है।
पिंगला या सूर्य नाड़ी : यह शरीर के दाएँ भाग का नियंत्रण करती है। यह गर्म है तथा व्यक्ति में प्राण-शक्ति का नियंत्रण करती है।
सुसुम्ना : यह मध्य नाड़ी है। मेरुदंड के मध्य में होकर मूलाधार तक जाती है। न गर्म न ठंडी, परंतु दोनों के संग लय में सहायक होती है। यह प्रकाश, ज्ञान और जागरण देती है। इन तीनों नाडि़यों में ठीक-ठीक संतुलन हो तो इनमें आरोग्य, बल, शांति तथा लम्बी आयु प्रदान करने की क्षमता है। इनमें संतुलन प्राणायाम की विधियों से होता है। यह तीनों नाडि़याँ शरीर की समस्त रक्त नलियों, कोशिकाओं आदि का केंद्र हैं। इन नाडि़यों से ही इन्हें शक्ति मिलती है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से जहाँ मन की ग्रंथियों से मुक्ति मिलती है, वहीं जीवनशक्ति बढ़ती है। पतंजलि ने चार प्रकार के प्राणायाम बताए हैं। प्रथम बाह्य वृत्तिक, द्वितीय आभ्यांतर वृत्तिक, तृतीय स्तम्भक वृत्तिक और चतुर्थ वह प्राणायाम होता है, जिसमें बाह्य एवं आभ्यांतर दोनों प्रकार के विषय का अतिक्रमण होता है, किंतु इसके अलावा भी प्राणायाम का उल्लेख है।
प्राणायाम के प्रकार : नाड़ीशोधन, भ्रस्त्रिका, उज्जाई, भ्रामरी, कपालभाती, शीतकारी आदि।
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