नाड़ीशोधन प्राणायाम
नाड़ी को बिना साफ व शुद्ध किये प्राणायाम साधना में सफलता नहीं मिलती। जिस तरह किसी कार्य को करने से पहले उस कार्य के लिए तैयारी करनी आवश्यक होती है, उसी तरह प्राणायाम साधना के लिए नाड़ी शोधन (नाड़ी को साफ करना) क्रिया करना आवश्यक है। प्राणायाम के अभ्यास में सांस लेने से प्राण का प्रवाह ब्रह्मरन्ध्र तक होना चाहिए। यह तभी संभव होता है, जब नाड़ियां साफ व शुद्ध होती है। नाड़ियां शुद्ध व साफ होने से ही प्राण (वायु) का प्रवाह शरीर में तेज गति से होता है। शरीर में नाड़ियों के प्रमुख तीन केन्द्र होते हैं- सुषुम्ना, इड़ा व पिंगला। इन्हीं तीनों नाड़ियों से होकर प्राण (वायु) बहकर चक्रों तक पहुंचकर चक्रों को जागृत करती है। मनुष्य के अन्दर इन चक्रों को जागने से ही व्यक्ति असंभव कार्य को भी करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। इन क्रियाओं में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होने से हानि होने की संभावना रहती है।
योग ग्रंथों में नाड़ी को साफ करने के लिए पहले षट्कर्मो का वर्णन किया गया है। योग में यह षट्कर्म है- धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, कपाल भांति, कुंजल। इन षट्कर्म के द्वारा मिलने वाले लाभ का वर्णन ´हठयोग प्रदीपिका´ में इस प्रकार किया गया है: ;षट्कर्मो के अभ्यास से शरीर की स्थूलता (ढीलापन), 20 प्रकार के कफ दोष, पित्त दोष और मल आदि खत्म हो जाते हैं। षट्कर्मो के बाद प्राणायाम किया जाए तो आसानी से प्राणायाम में सफलता प्राप्त होती है।
प्राणायम की शुरुआत आप नाड़ी शोधन प्राणायाम से कर सकते हैं। यह बहुत सरल है। आप इसका अभ्यास प्रभातकाल में करें। संध्यावंदन के समय भी आप इसका अभ्यास कर सकते हैं। गॉर्डन या घर के शुद्ध वातावरण में ही इसका अभ्यास करें।
नाड़ीशोधन प्राणायाम करने की विधि-
इसके अभ्यास के लिए पहले पद्मासन या सुखासन की स्थिति में बैठ जाएं। मन को एकाग्र करें अर्थात मन को शांत और स्थिर रखें। बाएं हाथ को बाएं घुटनें पर या दाएं कोहनी के नीचे रखें। अब शरीर को सीधा करके सिर, गर्दन व रीढ़ की हड्डी को तानकर रखें। अब नाक के दाहिने छिद्र को दाहिने हाथ के अंगूठे से बन्द करके बाएं छिद्र से धीरे-धीरे गहरी सांस लें। फिर नाक के बाएं छिद्र को बाकी अंगुलियों से बन्द करके नाक के दाएं छिद्र को खोलकर धीरे-धीरे सांस को बाहर छोड़ें। इसके बाद फिर नाक के दाएं छिद्र से ही गहरी सांस लें और नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से सांस को बाहर छोड़ें। इस तरह दाएं से सांस लेकर बाएं से छोड़ें और फिर बाएं से सांस लेकर दाएं से छोड़ें। इस तरह नाड़ी शोधन का एक चक्र पूरा होता है। इस क्रिया को 10 से 15 से बार करें तथा प्रतिदिन 1-1 चक्र बढ़ाते हुए 25 चक्र तक इसका अभ्यास करें। शुरू में 1:1:1 और 1:2:2 का अनुपात रखें। धीरे-धीरे आंतरिक कुंभक के अभ्यास को बढ़ाएँ। फिर 1:4:2 के अनुपात में करें। अनुपात को आप सेंकड समझ सकते हैं अर्थात 1 सेकंड तक श्वास अंदर लेना और 4 सेकंड तक रोकना और फिर 2 सेकंड तक छोड़ना।
लाभ: इससे सभी प्रकार की नाड़ियों को स्वस्थ लाभ मिलता है साथ ही नेत्र ज्योति बढ़ती है और रक्त संचालन सही रहता है। अनिद्रा रोग में लाभ मिलता है। यह तनाव घटाकर मस्तिष्क को शांत रखता है तथा व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का विकास करता है
सावधानी: उच्च रक्तचाप के रोगी को नाड़ी शोधन का अभ्यास नहीं करना चाहिए। रक्तचाप को समाप्त होने पर कुम्भक का अभ्यास कर सकते हैं। अभ्यास के अन्त में गहरी सांस लेकर ही अभ्यास को खत्म करना चाहिए। इसका अभ्यास पेड़, खुले मैदान अथवा समुद्र आदि स्थानों पर न करें तथा अभ्यास के समय शरीर खुला न रखें। इस क्रिया में जब सांस अनियमित हो जाए तो अभ्यास को रोककर तथा गहरी सांस लेकर कुछ देर आराम करें।
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