गृहस्थ मे सन्यास : ओशो
रजनीश एक अकेला नाम है, सदियों में अकेला नाम, जिसने दुनिया को भय मुक्त होने का संदेश दिया। कुछ लोग होते हैं- चिंतन, कला या विज्ञान के क्षेत्र में, जो प्रतिभाशाली होते हैं और कभी-कभी यह दुनिया उन्हें सम्मानित करती है। लेकिन रजनीश अकेले हैं, बिल्कुल अकेले, जिनके होने से यह दुनिया सम्मानित हुई, यह देश सम्मानित हुआ
ओशो: ''जिनका न कभी जन्म हुआ और न म़त्यु। 11दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 तक इस पृथ्वी ग्रह की यात्रा पर आए। '
ओशो ने धर्म को मुक्ति और उत्सव का रूप दिया। उन्होंने धर्म को दुख व उदासी से मुक्त किया। उनके शिष्यों की ओर देखो तो उनके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान बनी रहती है।
ओशो ने जो बुनियादी काम किया वह था धर्मों पर जमी हुई धूल को पोंछ डालने का। धर्म में जो-जो बेकार की चीजें थी, जो आदमियों की छाती पर हावी हो गई थी, उन्हें काट-काटकर अलग करने में उन्होंने जरा भी दया नहीं दिखाई। पूरे साहस के साथ उन्होंने उन चीजों की आलोचना की। और फिर जो-जो सार था, फिर वह चाहे जहां भी हो उसे संजोकर मनुष्य के लिए उपलब्ध करा दिया।
ओशो ने नव-संन्यास की अवधारणा दी। उन्होंने सम्यक सन्यास को पुनरुज्जीवित किया । ओशो ने पुनः उसे बुद्ध का ध्यान, कृष्ण की बांसुरी, मीरा के घुंघरू और कबीर की मस्ती दी । सन्यास पहले कभी भी इतना समृद्ध न था जितना ओशो के संस्पर्श से हुआ है। इसलिए यह नव-संन्यास है।
उनकी नजर में सन्यासी वह है जो अपने घर-संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए। उनकी दृष्टि में देश में हजारों वर्षों से प्रचलित संन्यास, जिसमें घर-परिवार छोड़कर, भगवे वस्त्र पहनकर जंगल गमन प्रचलित था, वह जीवन से भगोड़ापन है, पलायन है। वह सन्यास आसान था कि आप संसार से भाग खड़े हुए तो संसार की सब समस्याओं से मुक्त हो गए। लेकिन ऐसा सन्यास आनंद न बन सका, मस्ती न बन सका। दीन-हीनता में कहीं कोई प्रफुल्लता होती है ? धीरे-धीरे सन्यास पूर्णतः सड़ गया। सन्यास से वे बांसुरी के गीत खो गए जो भगवान श्रीकृष्ण के समय कभी गूंजे होंगे-सन्यास के मौलिक रूप में। अथवा राजा जनक के समय सन्यास ने जो गहराई छुई थी, वह संसार में कमल की भांति खिल कर जीने वाला सन्यास नदारद हो गया। नस-संन्यास के जरिए उन्होंने शिक्षा दी कि जिंदगी का उत्सव मनाओ, वास्तव में यही सच्चा सन्यास है। उन्होंने कहा, मनुष्य हंसना भूल गया है, जबकि हंसी सबसे बड़ा ध्यान है।
एक व्यक्ति जो प्रेम को उपलब्ध हो गया है, वह मर तो सकता है, परंतु उसका प्रेम बना रहता है। बुद्ध जा चुके हैं, उनका प्रेम जारी है। मैं विदा हो जाऊंगा, परंतु मेरा प्रेम बना रहेगा।
- Exercise best for Students
- Swine Flu in India--Pandemic Level:6
- How to cure hyperhidrosis.?
- Witnessing : The Most simple and Easily Done Meditation
- Vipassana meditation Technique : Osho
- Osho on Vipassana
- Osho on Chakras
- Swami Ramdev's Coming Yoga Camps (Shivir) & TV Schedule
- Spiritual Growth: Tips, Suggestions and Benefits
- Seven Ways to Improve your Attitude
