बोद्धों के विचार में ध्यान की तीन अवस्थाएं हैं: झिन्माई: पहली अवस्था में शून्यता उत्पन्न होती है । काम कुछ भी करते रहो, भीतर एक शून्यभाव छाया रहता है । जापान में उसे झिन्माई कहतें है । कभी कभी खुद को भी पता नहीं चलती वो अवस्था; क्योंकि बड़ी महीन और सूक्ष्म है , और अचेतन तल पर होती है । ध्यान करने वाले व्यक्ति को अक्सर हो जाती है झिन्माई । मतलब उसका इतना है कि वैसा व्यक्ति बाहर काम भी करता रहता है, लेकिन बाहर उसका रस नहीं रह जाता । बोलता है, उठता है, बैठता है, दूकान करता है, लेकिन रस उसका बाहर खो गया होता है । बस कर रहा होता है । कर्तव्य निभाता है। सारा रस भीतर चला गया है , और भीतर एक शून्य का अनुभव होने लगा है, जैसे कुछ भी नहीं है ; एक शांति गहन होने लगी है । यह पहली अवस्था है । सतोरी अवस्था तब आती है जब यह शून्य कभी- कभी इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि इस शून्य का बोध होता है , जागरण होता है । अचानक एक क्षण को जैसे बिजली कौंध जाये , ऐसा भीतर शून्य कौंध जाता है । मगर ऐसी कौंध कौंधती है, समाप्त हो जाती है । इस अवस्था को झेन में सतोरी कहतें हैं । सतोरी कई घट सकती हैं । समाधि ऐसी अवस्था है, बिजली जैसी नहीं , सूरज के उगने जैसी । उग गया तो उग गया । फिर ऐसा नहीं कि फिर बुझा । फिर उगा, फिर डूबा ऐसा नहीं है । उग गया । समाधि अंतिम अवस्था है । फल पक गया । समाधि उस क्षण का नाम है जो निर्वाण के एक क्षण पहले की है : फल पक गया है, बस अब टूटा, अब टूटा । और तब फल टूट गया । फल का टूट जाना निर्वाण है । लेकिन इस निर्वाण तक पहुँचने में पहले धयान या प्रेम के माध्यम से एक शून्यता साधी जाएगी एक भीतर ठहरना आ जायेगा; बाहर से हटना हो जायेगा ; उर्जा भीतर की तरफ बहने लगेगी; बाहर एक तरह की अनासक्ति छा जाएगी ; करने को सब किया जायेगा लेकिन करने में कोई रस न रह जायेगा हो जाये तो ठीक, न हो जाये तो ठीक सफलता हो कि असफलता, सुख मिले कि दुख- बराबर होगा; व्यक्ति ऐसे जीएगा जैसे नाटक में अभिनेता; अभिनय करेगा बस । निर्वाण के पहले ये तीन घटनाएं घटती हैं । पहले एक सातत्य बनता है भीतर अचेतन मन में; फिर चेतन में झलकें आनी शुरू होती हैं ; फिर कोई द्वार पर खड़ा होता जाता है; फिर सब खो जाता है । फिर न जानने वाला बचता है न जाना जाने वाला बचता; न ज्ञाता , ने ज्ञेय; न भक्त, न भगवान; फिर वही रह जाता है जो है । कृष्णमूर्ति जिसे कहते हैं that which is. वही रह जाता है निशब्द ! अनिर्वचनीय ! वही मंजिल है । वही पाना है ।
ओशो |