जीवन के तथाकथित सुखों की क्षणभंगुरता को देखो। उसका दर्शन ही, उनसे मुक्ति बन जाता है। किसी ने कोई लोक कथा सुनाई थी- एक चिडि़या आकाश में मंडरा रही थी। उसके ऊपर ही दूर पर चमकता हुआ एक शुभ्र बादल था। उसने अपने आप से कहा,' मैं उड़ूं और शुभ्र बादल को छूऊं।' ऐसा विचार कर उस बादल को लक्ष्य बना कर, वह चिडि़या अपनी पूरी शक्ति से उस दिशा में उड़ी। लेकिन वह बादल कभी पूर्व में कभी पश्चिम में चला जाता। कभी वह अचानक रुक जाता और कभी चक्कर पर चक्कर खाने लगता। फिर वह अपने आपको फैलाने लगा। वह चिडि़या उस तक पहुंच भी नहीं पायी कि अचानक वह छंट गया और नजरों से बिलकुल ओझल हो गया। उस चिडि़या ने अथक प्रयत्न से वहां पहुंच कर पाया कि वहां तो कुछ भी नहीं है। यह देखकर उस चिडि़या ने स्वयं से कहा, 'मैं भूल में पड़ गयी। क्षणभंगुर बादलों को नहीं, लक्ष्य तो पर्वत की उन गर्वीली चोटियों को ही बनाना चाहिए जो कि अनादि और अनंत हैं।' कितनी सत्य कथा है? और हममें से कितने हैं, जो कि क्षणभंगुर बादलों को जीवन का लक्ष्य बनाने के भ्रम में नहीं पड़ते हैं? लेकिन, देखो निकट ही अनादि और अनंत वे पर्वत भी हैं, जिन्हें जीवन का लक्ष्य बनाने से ही कृतार्थता और धन्यता उपलब्ध होती है। रवीन्द्रनाथ ने कहीं कहा है, ''वर्षा बिंदु ने चमेली के कान में कहा, 'प्रिय, मुझे सदा अपने हृदय में रखना।' और चमेली कुछ कह भी नहीं पाई कि भूमि पर जा पड़ी।'' -- ओशो
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