बाह्य प्राणायाम

प्रक्रिया :  ठुडी को गले से लगा दे, पेट के नीचे बन्द लगा दे और साँस बाहर छोडकर पेट को अन्दर रीढ की हड्डी से चिपका दे, थोडी देर साँस बाहर छोडकर रखे।
अवधि : इसे 2-5 बार करे. इस प्राणायाम से कपालभाति से मिलने वारे सारे फायदे होते है, दूसरे शब्दो मे यह कपालभाति का पूर्णक है।
लाभ : कब्ज, अँसीडीटी,गँसस्टीक, हर्निया, धातु,और पेशाब से संबंधित सभी समस्याएँ मिट जाती हैं सावधानी : हाइपरटेन्शन व ह्र्दय रोग से पीडीत व्यक्तियों को बाह्य प्राणायाम नहीं करना चाहिए ।
बाह्य प्राणायाम- विस्त्रित जानकारी
 प्रक्रिया :
  • इस प्राणायाम को करने के लिए आप सिद्धासन में बैठकर ( मतलब दोनों पेरो कि एडी को एक के ऊपर एक रखे तथा हाथो को घुटनों पर रखे और हाथो के अंगूठे तथा अंगूठे के पास वाली उंगली को मिलाकर अपने मेरुदण्ड को सीधा करके बैठ जाये ।  
  • अब श्वास को गहरा अन्दर भरें। 
  • अब श्वास को पुरी तरह से बाहर निकाल दे और पेट कि नाभि को मेरुदंड से मिलाने का प्रयत्न करे. क्षमता अनुसार इस स्थिति में रुके तथा फिर अपनी पूर्व स्थिति में आजावे | सांस को पूरी तरह बाहर निकालने के बाद सांस बाहर ही रोके रखने के बाद तीन बन्ध लगाते है| 
    • 1) जालंधर बन्ध :- गले को पूरा सिकुड के ठोडी को छाती से सटा कर रखना है।
    • 2) उड़ड्यान बन्ध :- पेट को पूरी तरह अन्दर पीठ की तरफ खीचना है।  
    • 3) मूल बन्ध :- हमारी मल विसर्जन करने की जगह को पूरी तरह ऊपर की तरफ खींचना है।  
अवधी:   इसे 2-5 बार करे । आप इसे इच्छा अनुसार दस से पन्द्रह मिनट तक भी कर सकते हैं ।
लाभ: 
  1. कब्ज, अँसीडीटी,गँसस्टीक, जैसी पेट की सभी समस्याएँ मिट जाती हैं । 
  2. हर्निया पूरी तरह ठीक हो जाता है। 
  3. यह आपकी डायबिटीज को दूर करता हैं ।  तथा उदर और पेन्क्रियास को ठीक रखता हैं ।  
  4. धातु,और पेशाब से संबंधित सभी समस्याएँ मिट जाती हैं । 
  5. मन की एकाग्रता बढती है । 
  6. व्यंधत्व (संतान हीनता) से छुट्कारा मिलने में भी सहायक है । 
सावधानियाँ:  ह्दयरोगी तथा उच्च रक्त चाप वाले व्यक्ति इसे न करे  ।  मासिकधर्म के समय महिलाये इस प्राणायाम को ना करे ।
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